मैं सीता हूँ
यह एक हिंदी कविता है जो रामायण को सीता की दृष्टि से समेटती है। यह कविता उनके भावनात्मक सफर, प्रेम, त्याग और आत्मबल को दर्शाती है:
जनकधारा की गोद से, पली-पोसी एक रेखा,
धरती से उपजी थी मैं, न कोई शंका, न लेखा।
स्वयंवर में धनुष टूटा, विधि ने बंधन बांधा,
राम से बंधी जो प्रीति थी, वो जन्मों का वादा।
कोमल थीं मेरी साँसें, पर मन में थी आग,
वनवास बना मेरा सिंदूर, पति संग मेरा भाग।
चरणों में कांटे चुभे, पर मन था दृढ़, अडोल,
तीनों लोकों में फिरती मैं, एक प्रेम की मिसाल।
सोने की मृग ने हर ली, एक क्षण की वो शांति,
लंका की राह जो मोड़ी, बन गई अग्निपरीक्षा की भ्रांति।
रावण की बंदी बनी मैं, पर आत्मा रही निडर,
हरण नहीं हो सकती नारी, जब हो मन में ईश्वर।
हनुमान लाए संदेशा, जलाया लंका का घमंड,
राम ने चलाया बाण, किया अधर्म का छंद।
पर युद्ध के बाद भी, जब प्रश्न उठे मेरी निष्ठा पर,
मैं अग्नि में कूदी, फिर भी न मिटा उनका डर।
फिर भी निभाया धर्म अपना, बनी मैं माँ, बनी मैं शक्ति,
पर जब भी आस्था डगमगाई, चली गई वन की भक्ति।
लव-कुश को जन्म दिया, अश्रु से नहीं भय से,
दुनिया ने सीता को देखा, पर जाना नहीं ह्रदय से।
मैं मिट्टी से बनी थी, मिट्टी में ही समा गई,
सीता न थी बस एक नाम, वो नारी की परछाई।
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