रामायण की दिव्य कथा
अयोध्या में गूंजा मंगल गान, रघुकुल में जन्मे श्रीराम महान। विष्णु स्वरूप, करुणा के सागर, धरा पे उतरे जग के उद्धार। जनकपुरी में जब स्वयंवर रचाया, शिव धनु को राम ने सहज उठाया। सीता संग पावन हुआ यह मिलन, बनी वह कथा, अमर प्रेम-प्रकटन। कैकई की माया, वचन की डोर, वनवास मिला चौदह वर्षों का जोर। राजधर्म निभाया, किए त्याग महान, भ्राता संग चले, त्यागे सुख-विधान। चित्रकूट में बसाया धाम, जहाँ बहा प्रेम का पावन प्रवाह। भरत ने जब चरण पादुका ली, भाईचारे की मिसाल वहीं खींची। दंडकारण्य की गाथा आई, जहाँ राक्षसों से युद्ध मचाई। शबरी के जूठे फल खाए, भक्तप्रेम से प्रभु लजाए। सीता का हरण, रावण का अभिमान, लंका की ओर चला धर्म का प्रस्थान। हनुमान गए सन्देशा ले, जला दी लंका, भक्ति में हे! सेतु बना सागर पे विशाल, वानर दल संग रचा कमाल। लंका में धर्म का दीप जला, रावण वध कर दिया न्याय खिला। अयोध्या फिर गूंजा विजय घोष, रामराज्य बना जग का प्रकाश। सीता संग हुआ राजतिलक, धरती पर फिर फैला शुभचक। रामायण नहीं केवल कथा, यह है धर्म, प्रेम, त्याग की व्यथा। हर युग में जो हमें सिखाए, सत्य पथ पर दृढ़ता बनाए। 🙏 जय श्री राम सिया र...